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Sunday, August 14, 2016

Salute to you Irom

इरोम तुम्हारे जज़्बे को सलाम 

जेल की सेल में तब्दील कर दिए गए मणिपुर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह कमरा दुनिया भर के पत्रकारों, नागरिक अधिकारों के पैरोकारों और एक्टिविस्ट के आकर्षण का एक केंद्र था लेकिन अब वहां का माहौल काफी बदला-बदला सा है. यह कमरा सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (अफस्पा) को समाप्त करने को लेकर पिछले 16  वर्षों से अनशन पर बैठी 44 वर्षीय इरोम चानू शर्मीला का लगभग स्थायी निवास बन चुका था.  उनके नाक में लगी नली और उनके खुले बाल शांतिपूर्वक सतत संघर्ष का एक प्रतीक बन चुके थे.


मणिपुर की राजधानी इंफाल से 15-16 किलोमीटर दूर मालोम में एक बस स्टैंड पर 02 नवंबर, 2000 को असम  राइफल्स के जवानों द्वारा 10 लोगों की कथित हत्या की गई थी. इस घटना से अत्यंत व्यथित होकर इरोम तब उसी बस स्टैंड के पास जाकर अनशन पर बैठ गई थीं. उनकी मांग थी कि अफस्पा को मणिपुर से समाप्त किया जाये जो सशस्त्र बलों को असीमित अधिकार देता है

Monday, May 23, 2016

जम्मू कश्मीर और अफस्पा को समझना जरुरी

(यह लेख मैंने आज से चार वर्ष, सात महीने पहले लिखा था और 30 अक्टूबर 2011 को यह प्रवक्ता.कॉम पर और "अखिल भारतीय पंचायत परिषद" की पत्रिका पंचायत सन्देश में प्रकाशित हुआ था. शायद दिल्ली की भीषण गर्मी के कारण आज जम्मू कश्मीर की बहुत याद आ रही है. हालाँकि ये बहुत छोटा कारण कहा जायेगा। मुझे फिर से कश्मीर की इतनी याद दिलाई इस साल यूपीएससी के दूसरे स्थान पर टॉप करने वाले अतहर आमिर-उल-सफी खान ने और लालू की चरण वंदना करने वाले कन्हैया कुमार ने. इसीलिए बिना किसी कांट छांट के, बिना किसी बदलाव के वही लेख अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ) 

जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर एक बार फिर हलचल शुरू हो गई है. वार्ताकारों ने अपनी रिपोर्ट गृहमंत्री को सौंप दी है और उस रिपोर्ट पर, जो अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है, लेखन और चर्चा बड़े स्तर पर प्रारंभ हो गई है. तीन सदस्यीय वार्ताकारों के इस दल ने काफ़ी मेहनत की है. राज्य के 700 प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की, उनकी बातें सुनीं और उनसे ज्ञापन लिए. ऐसे में जब तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो जाती बिना सर पैर के किसी पूर्वाग्रह के साथ कोई अनुमान लगाना ठीक नहीं होगा. हालाँकि वार्ताकारों के दामन  पर भी कुछ दाग दिखाई दिए लेकिन फिर भी हमें रिपोर्ट के सार्वजनिक  करना चाहिए।

दूसरी ओर जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जल्द ही राज्य से अफस्पा कानून हटाने की घोषणा करके एक नयी बहस को जन्म दे दिया है. इस बारे में उनका अमला सक्रिय भी हो गया हैं और कैबिनेट सचिव अजित सेठ के साथ बातचीत भी शुरू हो गई है. इसी बीच इत्तेफाक हुआ कि अफस्पा हटाने की गर्मागर्म  ही घाटी में चार ग्रेनेड भी फेंके जा चुके हैं.  सेना भी अफस्पा न हटाने का सुझाव दे चुकी है.  मुख्यमंत्री भी बैकफुट पर हैं और कहा है की राज्य में सेना की भूमिका महत्वपूर्ण है. अफस्पा हटाना सही नहीं, अफस्पा हटेगा नहीं  गर्त में है लेकिन हमें अफस्पा यानि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को समझने की जरुरत है